यहां राम-रावण से नहीं है दशहरे का जुड़ाव, 21 रस्मों में की जाती है मां की पूजा

रायपुर । प्रदेश के साथ-साथ पूरे देश में दशहरा पर्व बड़ी ही धूमधाम से मनाया जा रहा है। कई जगहों पर रावण का दहन किया जाना है तो कई इलाकों में रावण की पूजा की जा रही है। वहीं कई स्थानों पर मिट्टी के बने रावण का वध किया जा रहा है।

अलग-अलग इलाकों में भिन्न-भिन्न तरह से विजयादशमी की धूम हैं, लेकिन इन सबसे इतर है बस्तर का दशहरा जो देश में सबसे लंबा चलता है। यह एकमात्र ऐसा दशहरा है जिसका जुड़ाव न तो राम से है और न ही रावण से। बस्तर दशहरे में मां दंतेश्वरी की पूजा होती है।

इस त्योहार में 21 रस्में पूरी की जाती हैं। सर्व आदिवासी समाज के महिला विंग की पूर्व अध्यक्ष शांति सलाम ने बताया कि यह रामायण से नहीं बल्कि जगन्नाथ पुरी में होने वाली रथयात्रा से प्रेरित दशहरा महोत्सव है। 600 साल पहले बस्तर के राजा को पुरी में आर्शिवाद मिला, उन्होंने यहां आकर इसकी शुरुआत की।

बस्तर के जनमानस और लोकगीतों में यह कथा प्रचलित है कि मां दुर्गा से पहले महिषासुर से युद्ध करने के लिए जो देवियां गईं, उन्हें वह अपने सींगों में फंसाकर छिटक देता था। अंतत: दुर्गा आईं और बड़ेडोंगर की पहाड़ी पर महिषासुर का वध कर दिया। आज भी इस पहाड़ी पर देवी की सवारी सिंह के पंजे के निशान हैं।

इधर छिटकी गईं देवियां जहां-जहां गिरीं, वहां माता गुड़ी बन गईं। वह देवियां बस्तर में नेतानारीन, लोहांडीगुडीन, नगरनारीन, बंजारीन, तेलीनसत्ती, बास्तानारीन आदि नामों से पूजी जाती हैं। लोकगीतों में तीन सौ से अधिक देवियों का उल्लेख मिलता है। इन देवियों का सुमिरन बस्तर दशहरा के दौरान पारंपरिक धनकुल वाद्य के साथ गाए जाने वाले लोकगीतों में होता है। इन गीतों में कहीं भी राम-रावण का प्रसंग नहीं आता।